अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) में मंगल दोष पूजा: विधि एवं महत्व

हिंदू ज्योतिष शास्त्र में मंगल को “क्रूर ग्रह” का नाम दिया गया है, परंतु यही मंगल साहस, पराक्रम, भूमि, रक्त, ऊर्जा और युद्ध कौशल का प्रतीक भी है। जब किसी व्यक्ति की जन्म कुंडली में मंगल अशुभ स्थिति में हो — विशेषकर लग्न, दूसरे, चौथे, सातवें, आठवें या बारहवें भाव में — तो उसे “मंगल दोष” या “कुज दोष” या “भौम दोष” कहा जाता है। यह दोष विवाह में विलंब, दांपत्य कलह और आकस्मिक क्रोध का कारण बनता है।

अब जब मंगल की पीड़ा का निवारण अधिक मास अर्थात् पुरुषोत्तम मास में किया जाए, तो परिणाम सामान्य माह की अपेक्षा अत्यंत विशिष्ट और शीघ्र फलदायी होते हैं। अधिक मास में उज्जैन में मंगल दोष पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान मात्र नहीं, बल्कि एक ज्योतिषीय चिकित्सा है जो कुंडली की अग्नि तत्व को संतुलित कर जीवन में स्थिरता लाती है।

मंगल दोष (कुज दोष) का ज्योतिषीय महत्व क्या है?

अधिक मास में मंगल दोष पूजा केवल एक धार्मिक कर्म नहीं, अपितु एक ज्योतिषीय अनिवार्यता है जो हर तीन वर्ष में एक बार प्राप्त होती है। मंगल की क्रूरता जो विवाह, स्वास्थ्य, धन और संबंधों को नष्ट करती है, इस दिव्य मास में विष्णु कृपा, हनुमान बल और शिव आशीर्वाद से “मंगलमय” हो जाती है।

मंगल कब दोष देता है?

मंगल दोष की स्थिति तब बनती है जब मंगल निम्नलिखित भावों में बैठकर कुंडली में अशुभ प्रभाव डालता है:

भावदोष का नाममुख्य प्रभाव
1st (लग्न)लग्न मंगल दोषआक्रामक व्यवहार, चेहरे पर घाव, मानसिक अस्थिरता
2ndधन भाव मंगलवाणी में कठोरता, कुटुंब कलह, धन हानि
4thसुख भाव मंगलवाहन दुर्घटना, माता से मतभेद, भूमि विवाद
7thकलत्र मंगल दोषविवाह में विलंब/टूटना, दांपत्य अस्थिरता, जीवनसाथी को रोग
8thअष्टम मंगलअकाल मृत्यु भय, गुप्त रोग, अप्रत्याशित हानि
12thव्यय भाव मंगलकर्ज़, न्यायालयीन मामले, शत्रु से हानि, अस्पताल

मंगल दोष के प्रकार कितने है?

ज्योतिषाचार्य विजय जोशी जी के अनुसार, मंगल दोष को तीन श्रेणियों में बाँटा जा सकता है:

  1. उच्च मंगल दोष — मंगल मेष, वृश्चिक या मकर में बैठकर उपरोक्त भावों में हो। यह सर्वाधिक कष्टदायी।
  2. मध्यम मंगल दोष — मंगल कर्क, सिंह या धनु में हो। प्रभाव मध्यम रहता है।
  3. सामान्य मंगल दोष — मंगल मित्र राशि में हो या गुरु की दृष्टि में हो। प्रभाव कम परंतु विवाह में बाधा देता है।

मंगल दोष के ज्योतिषीय लक्षण कौन-कौन से है?

  • शारीरिक: रक्तचाप, piles, त्वचा जलन, सिरदर्द, अनिद्रा, मासिक धर्म संबंधी समस्याएँ (महिलाओं में)
  • मानसिक: अत्यधिक क्रोध, आवेश में निर्णय, हिंसक प्रवृत्ति, धैर्य का अभाव
  • व्यावसायिक: अधूरे कार्य, सहकर्मियों से टकराव, प्रॉपर्टी विवाद, निर्माण कार्य में बाधा
  • पारिवारिक: विवाह में बार-बार असफलता, गृहस्थ जीवन में तनाव, संतान को चोट
  • आर्थिक: जल्दबाज़ी में निवेश से हानि, अग्नि से धन नष्ट होना

अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) में मंगल शांति पूजा का महत्व क्या है?

मंगल और अधिक मास का गूढ़ संबंध

अधिक मास को भगवान विष्णु का मास माना जाता है। ज्योतिष में विष्णु “ग्रहपति” हैं — समस्त ग्रहों के स्वामी। जब विष्णु के इस दुर्लभ मास में मंगल की शांति की जाती है, तो मंगल की क्रूरता पर “विष्णु माया” का प्रभाव पड़ता है और मंगल का क्रूर ग्रह “मंगलमय” हो जाता है।

विष्णु पुराण के अनुसार, अधिक मास में किया गया कोई भी ग्रह शांति अनुष्ठान सामान्य माह की अपेक्षा 33 गुणा अधिक फलदायी होता है। मंगल जो कि अग्नि तत्व का प्रतीक है, इस मास में पुरुषोत्तम विष्णु की जल तत्व कृपा से संतुलित होता है।

मंगल दोष पूजा के लिए अधिक मास की विशेष तिथियाँ क्या है?

तिथि/दिनमहत्व
मंगलवारमंगलवार को की गई मंगल पूजा अधिक मास में अक्षय फलदायी
हनुमान जयंती (यदि पड़े)हनुमान जी मंगल के अधिपति माने जाते हैं
पंचक से बचकरपंचक में पूजा न करें
मासिक शिवरात्रिभगवान शंकर मंगल के गुरु हैं; शिवरात्रि पर पूजा विशेष लाभदायक
अमावस्यापितृ मंगल दोष (पितृ कर्म से जुड़ा) के लिए अमावस्या श्रेष्ठ

अधिक मास में मंगल दोष पूजा क्यों की जाती है? (The Core Why)

1. अग्नि-जल संतुलन की प्रक्रिया

मंगल अग्नि तत्व का ग्रह है। अधिक मास में विष्णु की जल तत्व कृपा प्रबल होती है। जब अग्नि और जल का संगम होता है, तो मंगल की अत्यधिक तीव्रता ठंडी होकर “सात्विक ऊर्जा” में परिवर्तित होती है। यही कारण है कि अधिक मास में मंगल दोष निवारण शीघ्र कारगर होता है।

2. पुरुषोत्तम व्रत का प्रभाव

अधिक मास में पुरुषोत्तम व्रत रखने से व्यक्ति के तीनों दोष (सात्विक, राजसिक, तामसिक) शांत होते हैं। मंगल तामसिक ग्रह है; इस मास में उसकी तामसिकता नष्ट होती है।

3. दुर्लभ अवसर (3 वर्ष में एक बार)

मंगल दोष एक दीर्घकालिक दोष है। इसका निवारण निरंतरता चाहता है। अधिक मास जो 3 वर्ष में एक बार आता है, उसमें किया गया अनुष्ठान “एक बार में तीन वर्षों का प्रभाव” देता है।

4. विवाह योग्य व्यक्तियों के लिए विशेष

जिन लोगों का विवाह मंगल दोष के कारण बार-बार टूट रहा हो या विलंबित हो रहा हो, उनके लिए अधिक मास में मंगल शांति “अंतिम उपाय” का कार्य करती है। इस मास में विवाह से पूर्व मंगल दोष पूजा कराने से दांपत्य जीवन में मधुरता आती है।

5. भूमि और संपत्ति विवादों का अंत

मंगल भूमि का कारक है। अधिक मास में मंगल पूजा से भूमि संबंधी मुकदमे, संपत्ति विवाद और निर्माण कार्य में आ रही बाधाएँ शीघ्र समाप्त होती हैं।

अधिक मास में मंगल दोष पूजा कैसे की जाती है? जाने विधि

कुंडली विश्लेषण एवं मुहूर्त निर्धारण

पूजा से पूर्व अनुभवी ज्योतिषाचार्य द्वारा कुंडली का विस्तृत विश्लेषण आवश्यक है। यह जानना ज़रूरी है कि:

  • मंगल किस भाव में है?
  • किस राशि/नक्षत्र में है?
  • किस दशा में जातक चल रहा है?
  • मंगल की दृष्टि कहाँ-कहाँ पड़ रही है?
  • अस्टकवर्ग में मंगल की बलाबल क्या है?

इसके बाद ही अधिक मास के शुभ मंगलवार या अन्य शुभ मुहूर्त का चयन किया जाता है।

संकल्प (Sankalp)

प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर, लाल वस्त्र धारण कर, रुद्राक्ष या लाल मूंगे की माला लेकर संकल्प करें:

“ॐ विष्णुः पुरुषोत्तमो वासुदेवः, अधिक मासे मम कुजदोष निवारणार्थं, भौमशांतये, सुखसमृद्धये, कलत्रसौख्याय च जपं करिष्ये।”

मंगल यंत्र/मूर्ति स्थापना

मंगल यंत्र (ताम्र या भट्टी में बना) को लाल वस्त्र पर स्थापित करें। साथ में भगवान हनुमान की प्रतिमा, भैरव जी की प्रतिमा और पार्थिव शिवलिंग भी रखें। मंगल के साथी देवता हनुमान और भैरव हैं; उनकी सह-पूजा अनिवार्य है।

पंचामृत स्नान एवं अभिषेक

मंगल यंत्र पर इस क्रम में अभिषेक करें:

  1. गंगाजल
  2. कच्चे दूध
  3. दही
  4. शहद
  5. घी
  6. शक्कर मिश्रित जल
  7. अंत में गंगाजल

मंगल अभिषेक मंत्र:

ॐ अं अंगारकाय नमः

षोडशोपचार पूजा

मंगल को षोडशोपचार (16 उपचारों) से पूजें:

उपचारसामग्री
आसनलाल कपड़ा
पाद्यजल में लाल चंदन
अर्घ्यलाल फूल (गेंदा/गुलाब)
आचमनगंगाजल
मधुपर्कशहद-दही मिश्रण
स्नानपंचामृत
वस्त्रलाल वस्त्र (कलावा)
यज्ञोपवीतलाल धागा
गंधकेसर मिश्रित चंदन
पुष्पलाल गुलाब, जवा (जास्वंद)
धूपगugal या लोबान
दीपतिल के तेल/घी का दीप
नैवेद्यगुड़, तिल, गेहूं, मसूर
ताम्बूलपान, सुपारी, लौंग
नीराजनकपूर की आरती
प्रदक्षिणादक्षिणावर्त (घड़ी की दिशा में)

मंगल मंत्र जप (मुख्य अनुष्ठान)

प्रधान मंत्र:

ॐ क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः

संख्या: अधिक मास में कम से कम 10,000 बार जप करना चाहिए। यदि संभव हो तो 1,25,000 (एक लाख पचीस हज़ार) बार जप करना सर्वोत्तम है। यदि समय कम हो, तो पंडित जी से एक दिन में 10,000 और कुल 11 दिनों में 1,10,000 जप कराया जा सकता है।

अन्य प्रभावी मंत्र:

  • ॐ हनुमते नमः — 21,000 बार
  • ॐ नमो भगवते वासुदेवाय — 5,000 बार
  • ॐ अं अंगारकाय नमः — 10,000 बार
  • भैरव मंत्र: ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं ह्रः फट् भैरवाय नमः — 5,000 बार

हवन (अग्नि कुंड में आहुतियाँ)

मंगल हवन के लिए पलाश, खैर या बेल की लकड़ी का प्रयोग करें। आहुतियों में:

  • लाल तिल
  • गुड़
  • मसूर की दाल
  • गेहूं
  • घी
  • लाल चंदन

हवन मंत्र:

ॐ क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः स्वाहा

संख्या: न्यूनतम 108, अधिकतम 1008 आहुतियाँ।

मंगल दान (विशेष रूप से महत्वपूर्ण)

मंगल दोष निवारण के लिए दान अत्यंत आवश्यक है। अधिक मास में दान का फल अक्षय होता है:

दानलाभ
लाल वस्त्रमंगल की क्रूरता शांत
मसूर दालरक्त रोग निवारण
गुड़क्रोध शमन
ताम्र पात्रभूमि सुख
तलवार/कटार (प्रतीकस्वरूप)शत्रु नाश
भोजन लाल वस्त्र धारी ब्राह्मण कोमंगल तृप्ति
हनुमान मंदिर में तेल/सिंदूरआरोग्य लाभ

पूर्णाहुति एवं कलावा धारण

हवन के बाद पूर्णाहुति दें। पंडित जी द्वारा “मंगल सूत्र” या “रक्षा कलावा” (लाल धागा) को मंत्रोच्चार से जपवाकर प्रसादस्वरूप दिया जाता है। इसे दाहिने हाथ (पुरुष) या बाएँ हाथ (महिला) पर बाँधा जाता है। या फिर घर के दरवाज़े पर बाँधा जा सकता है।

पार्थिव शिवलिंग विसर्जन

यदि पूजा में पार्थिव (मिट्टी का) शिवलिंग बनाया गया हो, तो उसे नदी/सरोवर में विसर्जित करें। मंगल शांति में शिवलिंग विसर्जन “शिव-मंगल योग” का निर्माण करता है।

अधिक मास में मंगल पूजा की विशेषताएँ कौन-सी है?

1. मंगल-हनुमान-भैरव त्रिदेव संयोग

अन्य पूजाओं में केवल एक देवता की पूजा होती है, परंतु मंगल दोष पूजा में “मंगल ग्रह + हनुमान + भैरव + शिव” की चतुर्देव पूजा होती है। यह संयोग अधिक मास में अत्यंत प्रबल होता है।

2. रक्त दान का विशेष महत्व

अधिक मास में मंगल दोष पूजा के दिन या मंगलवार को रक्त दान करना अत्यंत लाभदायक माना जाता है। मंगल रक्त का कारक है; रक्त दान से मंगल तृप्त होता है। यह विशेषता अन्य ग्रह पूजाओं में नहीं मिलती।

3. लाल वस्त्र साधना

अधिक मास में मंगल पूजा के दौरान 9 दिनों तक नित्य लाल वस्त्र धारण करना चाहिए। यह “रंग चिकित्सा” (Color Therapy) और ज्योतिष का अद्भुत संगम है।

4. अग्नि उपासना का प्राधान्य

मंगल पूजा में “दीपदान” का विशेष महत्व है। अधिक मास में 11, 21, या 51 दीपक एक साथ जलाकर मंगलवार को हनुमान मंदिर में दीपदान करना चाहिए।

5. मंगल स्तोत्र का पाठ

“मंगल स्तोत्र” या “भ argव स्तोत्र” का पाठ इस मास में अवश्य करना चाहिए:

“धरणीगर्भसमुद्भूतं विद्युत्कांतिसमप्रभम्।कुमारं शक्तिहस्तं च मंगलं प्रणमाम्यहम्।।”

अधिक मास में मंगल पूजा के लाभ कौन-कौन से है?

  • क्रोध में शांति और आवेश में नियंत्रण
  • नींद की गुणवत्ता में बढ़ोतरी
  • विवाह के रुके प्रस्ताग आगे बढ़ना
  • नौकरी/व्यापार में स्थिरता
  • दांपत्य जीवन में मधुरता
  • शत्रुओं का आत्मसमर्पण या दूर होना
  • संतान प्राप्ति में सहायता
  • कुंडली से मंगल दोष का स्थायी निवारण
  • शारीरिक शक्ति और ऊर्जा में वृद्धि

अधिक मास में सावधानियाँ और नियम

पूजा से पूर्व

  • 21 दिन पूर्व से मांसाहार, मदिरा, नशा पूर्णतः त्यागें
  • ब्रह्मचर्य का पालन करें (पूजा से 7 दिन पूर्व और 7 दिन बाद)
  • प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करना आरंभ करें
  • लाल रंग का प्रयोग बढ़ाएँ (वस्त्र, आसन, पुष्प)

पूजा के दौरान

  • क्रोध न करें; मंगल दोष वाले व्यक्ति को विशेष रूप से क्रोध पर नियंत्रण रखना होगा
  • अग्नि का सम्मान करें; चूल्हे/दीपक पर पैर न रखें
  • तामसिक भोजन (प्याज, लहसुन, अंडा, मांस) से दूर रहें
  • पंडित जी के निर्देशों का पूर्ण पालन करें

पूजा के बाद

  • 11 मंगलवार तक हनुमान मंदिर नित्य जाएँ
  • मंगलवार के व्रत रखें (एक समय भोजन, गुड़-रोटी या दाल-रोटी)
  • लाल वस्त्र किसी ज़रूरतमंद को दान करें
  • अधिक मास के पूरे माह यदि संभव हो तो “मंगल चंडी” या “रुद्राभिषेक” नित्य कराएँ

अधिक मास vs सामान्य मास: मंगल पूजा में अंतर

पक्षसामान्य मासअधिक मास (पुरुषोत्तम)
फल की गुणवत्ता1 गुना33-100 गुना अधिक
मंत्र जप की संख्या10,000 पर्याप्त10,000 न्यूनतम, 1,25,000 श्रेष्ठ
दान का महत्वसामान्यअक्षय (कभी नष्ट न होने वाला पुण्य)
विवाह योग्यता6-12 महीने लग सकते हैं3-6 महीने में प्रभाव
पितृ दोष संगमकेवल मंगल शांतिमंगल + पितृ दोष दोनों शांति
आध्यात्मिक लाभसामान्यमोक्ष की ओर अग्रसर
दुर्लभतावर्षभर उपलब्ध3 वर्ष में एक बार

अधिक मास में मंगल पूजा की प्राचीन मान्यता

स्कंद पुराण में वर्णित है कि जब भगवान कार्तिकेय (मंगल के स्वामी कुमार) ने राक्षस तारकासुर का वध किया, तब उन्होंने मंगल शांति हेतु पुरुषोत्तम मास में तपस्या की थी। तभी से यह परंपरा चली आ रही है कि मंगल पीड़ा से ग्रस्त व्यक्ति को अधिक मास में मंगल पूजा अवश्य करानी चाहिए।

ब्रह्मवैवर्त पुराण में कहा गया है: “यः पुरुषोत्तमे मासे कुजदोष निवारणम्। करोति विधिवत् भक्त्या स याति परमां गतिम्।” — अर्थात् जो व्यक्ति पुरुषोत्तम मास में विधिवत मंगल दोष निवारण करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।

यदि आपकी कुंडली में मंगल दोष है, आपका विवाह टूट रहा है, व्यापार में अग्नि जैसी हानि हो रही है, या शारीरिक रक्त संबंधी समस्याएँ बनी हुई हैं, तो आगामी अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) को न गँवाएँ। अनुभवी ज्योतिषाचार्य की देखरेख में, शुद्ध वैदिक विधि से, श्रद्धापूर्वक यह अनुष्ठान संपन्न कराएँ। अभी पंडित विजय जोशी जी से संपर्क करें।

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